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लोन लेने का 20/4/10 नियम
लोन लेने का 20/4/10 नियम

कार खरीदने से पहले जान लें ये 20/4/10 का गोल्डन रूल

30 Sept 2025
Key highlights
  • 1
    कार खरीदना एक बड़ा खर्च होता है, जिसके लिए सही फाइनेंशियल प्लानिंग ज़रूरी होती है
  • 2
    20/4/10 नियम से सही लोन प्लानिंग होती है — ज्यादा डाउनपेमेंट और कम EMI के साथ
  • 3
    20/4/10 कार रूल हर तरह के बजट और ज़रूरतों के लिए फायदेमंद रहता है
आउटलाइन

घर के बाद अगर कोई सबसे बड़ा खर्च होता है, तो वो है कार खरीदना। ये एक ऐसा फैसला होता है जिसमें आपके इमोशन भी जुड़े होते हैं और आपकी जेब भी। नई गाड़ी लेने का सपना हर किसी का होता है, लेकिन सिर्फ सपना देखकर बिना सोचे समझे खर्च करना सही नहीं।

 

कई लोग गाड़ी के मॉडल, फीचर्स और स्टाइल पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन बजट और फाइनेंस प्लानिंग पर नहीं। इसी के लिए एक खास नियम है — 20/4/10 रूल, जो आपको बताता है कि गाड़ी खरीदते वक्त कितना डाउन पेमेंट देना चाहिए, कितना लोन लेना सही रहेगा और ईएमआई आपकी सैलरी का कितना हिस्सा होनी चाहिए।

 

Cars24 ने इस नियम पर एक आसान और काम की गाइड तैयार की है — जिसमें बताया गया है कि इस नियम को कैसे अपनाएं, और कैसे बचें उन गलतियों से जो अक्सर लोग गाड़ी खरीदते वक्त कर बैठते हैं। तो अगली बार जब भी गाड़ी खरीदने का मन बने, पहले ये रूल ज़रूर याद रखें — ताकि गाड़ी चलाने का मजा लें, ना कि उसके कर्ज का बोझ!

 

20/4/10 नियम क्या है?

 

गाड़ी खरीदने का सीधा, समझदारी भरा फॉर्मूला !

 

अगर आप सोच रहे हैं कि नई कार खरीदें लेकिन बजट कैसे सेट करें – तो 20/4/10 नियम आपके बड़े काम का है। ये एक आसान सा फार्मूला है जो बताता है कि कितने पैसे डाउन पेमेंट देने चाहिए, लोन कितने समय का होना चाहिए, और आपकी कमाई में से कितना हिस्सा कार पर खर्च होना ठीक है। आइए, इसे आसान भाषा में समझते हैं:

 

1. 20% डाउन पेमेंट करें

मतलब गाड़ी की कुल ऑन-रोड कीमत का कम से कम 20% आपको अपने पॉकेट से देना चाहिए। पूरा लोन लेने से आपकी ईएमआई तो बन जाएगी, लेकिन ब्याज ज़्यादा देना पड़ेगा और फाइनेंशियल बोझ भी बढ़ेगा।

 

2. 4 साल से ज़्यादा का लोन न लें

लोन की लंबी अवधि देखकर लोग खुश हो जाते हैं कि EMI कम हो रही है। लेकिन ऐसा करने से आप ज़्यादा ब्याज चुकाते हैं। इस रूल के मुताबिक, कार लोन की अवधि 4 साल से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए।

 

3. महीने की कमाई का 10% ही खर्च करें

आपके महीने की टोटल इनकम का सिर्फ 10% हिस्सा ही कार से जुड़े खर्चों पर जाना चाहिए – यानी ईंधन, EMI, मेंटेनेंस वगैरह। इससे आपका बजट बैलेंस रहेगा और बाकी ज़रूरी चीज़ों पर असर नहीं पड़ेगा।

 

सीधी बात ये है – गाड़ी खरीदनी है तो जोश के साथ होश भी रखें। ये 20/4/10 नियम आपकी जेब का ध्यान रखता है और आपको ये तय करने में मदद करता है कि गाड़ी खरीदना आपके लिए फिलहाल सही है या थोड़ा इंतज़ार बेहतर रहेगा।

चाहें नई कार हो या पुरानी, ये नियम अपनाने से आपकी खरीदारी समझदारी भरी होगी – बिना जेब पर भारी पड़े।

 

20/4/10 कार खरीदने का नियम कैसे काम करता है?

 

लोन लेने का 20/4/10 नियम

 

पहले बजट तय करो, फिर कार चुनो — यही है स्मार्ट तरीका!

 

इस नियम को सही तरीके से अपनाने के लिए पहली और सबसे जरूरी बात ये है कि जिस कार को आप खरीदना चाहते हैं, उसकी कुल कीमत (यानि ऑन-रोड कीमत) आपकी सालाना कमाई के 50% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।

 

मतलब?

अगर आपकी सालाना इनकम ₹20 लाख है, तो आपको ₹10 लाख से ज्यादा की गाड़ी के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए।
इससे दो फायदे होंगे:

 

  1. आप अपने बजट में रहने वाली कारों की लिस्ट बना पाएंगे।
     
  2. और आप बिना जरूरत महंगी गाड़ी लेने की जल्दबाज़ी से बच जाएंगे।
     

जैसे-जैसे आपकी कमाई बढ़ेगी, वैसे-वैसे आप बेहतर और महंगी गाड़ियों को भी अफोर्ड कर सकेंगे।
मान लीजिए आपकी इनकम ₹30 लाख है, तो अब आप ₹15 लाख तक की कार पर विचार कर सकते हैं।

और हां, अगर आपको बोनस, प्रमोशन या कोई एक्स्ट्रा इनकम मिलने वाली हो, तो उस समय कार खरीदने से आपके पास थोड़ी और बेहतर ऑप्शन चुनने की आज़ादी होगी।

 

अब जब आपने कार की कीमत तय कर ली है (यानि अपनी सालाना इनकम का आधा), तो चलिए अब 20/4/10 नियम के तीनों हिस्सों को एक-एक करके समझते हैं।

 

20% डाउन पेमेंट क्यों ज़रूरी है?

 

लोन लेने का 20/4/10 नियम

 

थोड़ा अभी दो, बाकी आराम से भरो – यही है समझदारी!

जब आप कार खरीदते हैं, तो एक हिस्सा खुद से देना होता है और बाकी बैंक या फाइनेंस कंपनी से लोन लेना होता है। यही अपना होता है डाउन पेमेंट। 20/4/10 नियम कहता है कि कार की कुल कीमत का कम से कम 20% आपको अपने जेब से देना चाहिए।

अब सोचिए, ऐसा क्यों?

 

1. लोन कम लेना पड़ेगा

 

मान लीजिए कार की ऑन-रोड कीमत है ₹10 लाख।
अगर आप ₹2 लाख (यानि 20%) खुद दे देते हैं, तो अब आपको लोन सिर्फ ₹8 लाख का लेना पड़ेगा।
कम लोन, कम टेंशन!

 

2. EMI भी कम हो जाती है

 

जब लोन कम होगा, तो उस पर लगने वाला ब्याज भी कम होगा।
मतलब आपकी हर महीने की EMI छोटी हो जाएगी और आपकी कमाई पर ज्यादा बोझ नहीं पड़ेगा।

 

3. ब्याज में बचत

 

कम लोन मतलब कम ब्याज। और ब्याज की रकम जितनी कम होगी, उतनी ही आपकी लाइफ टाइम सेविंग ज़्यादा होगी।
सोचिए, सालों तक EMI में जो पैसा जाता, वो अब आपकी जेब में रहेगा।

 

4. नुकसान से बचाव (Negative Equity से बचना)

 

जैसे ही आप कार शोरूम से बाहर निकालते हैं, उसकी कीमत गिरने लगती है। अगर आपने ज़्यादा लोन ले लिया है और डाउन पेमेंट ना के बराबर किया है, तो कुछ साल बाद आपकी कार की वैल्यू लोन से भी कम हो सकती है। इसी को कहते हैं नकारात्मक इक्विटी — और इससे बचना बहुत जरूरी है। 20% डाउन पेमेंट करके आप इस खतरे को काफी हद तक टाल सकते हैं।

 

तो अगली बार कार खरीदने जाएं, तो ये याद रखें:
"जितना हो सके, पहले थोड़ा और दो — बाद में आराम से भरो।"

 

4 साल में लोन खत्म करो – क्यों ज़रूरी है?

 

"लोन जितना छोटा, बोझ उतना हल्का!"


20/4/10 नियम का दूसरा पड़ाव है – 4 साल की लोन अवधि। मतलब ये कि आप कार का लोन 4 साल (48 महीने) में पूरा चुका दें। सुनने में सीधा लगता है, लेकिन इसके पीछे बड़ी समझदारी छिपी है।

 

EMI कम करने के चक्कर में लंबा लोन क्यों भारी पड़ता है?

 

अब आप सोच सकते हैं – “अरे भई, EMI कम करनी है तो लोन को 6 या 7 साल में क्यों न चुकाएं?” बात सही लगती है… लेकिन अंदर की सच्चाई ये है:

 

  • जितनी लंबी अवधि, उतना ज्यादा ब्याज।
     
  • कार की वैल्यू घटती है, लेकिन लोन लंबा चलता है – इससे आप जा सकते हैं Negative Equity की फंदे में।
     
  • और फिर सालों तक EMI चुकाना भी तो मानसिक बोझ है!

     

कैसे निभाएं 4 साल की लोन शर्त?

 

1. सस्ती कार लो – दिखावे से बचो:


ऐसी कार चुनो जो आपकी सैलरी और बजट के हिसाब से फिट बैठे। अगर आपकी सालाना इनकम ₹20 लाख है, तो ₹10 लाख से ज्यादा की कार मत लो। इससे EMI भी काबू में रहेगी।

 

2. डाउन पेमेंट थोड़ा और बढ़ाओ:


अगर पॉसिबल हो, तो ₹2 लाख की जगह ₹3 लाख दे दो। इससे लोन कम लेना पड़ेगा और 4 साल में बड़ी आसानी से निपट जाएगा।

 

3. बैंकों के ऑफर अच्छे से टटोलो:


हर बैंक की ब्याज दर अलग होती है। थोड़ा वक्त निकालो, कंपेयर करो और ऐसा लोन चुनो जो 4 साल में खत्म हो और ब्याज भी कम हो।

 

एक सिंपल उदाहरण से समझो

 

मान लो आपने ₹10 लाख की कार खरीदी:

 

  • ₹2 लाख दिया डाउन पेमेंट (20%)
     
  • ₹8 लाख का लिया लोन
     
  • ब्याज दर 8% सालाना
     

तो 4 साल की EMI होगी लगभग ₹19,530 और कुल ब्याज देना पड़ेगा ₹1.37 लाख। अब अगर आप यही लोन 6 साल के लिए लेते हैं:

 

  • EMI घट जाएगी – सिर्फ ₹14,027 पर कुल ब्याज बढ़ जाएगा ₹2.10 लाख!
     

मतलब आप हर महीने थोड़ी EMI कम देकर 73 हज़ार रुपये ज़्यादा फूंक देंगे।

 

तो समझदारी क्या है?

 

"EMI थोड़ी ज़्यादा चलेगी, लेकिन लोन जल्दी निपटेगा। और ब्याज के लाखों रुपये आपकी जेब में बचेंगे!"

 

हर महीने कार पर कितना खर्च करना ठीक है?

 

सोचिए, आप बड़ी मेहनत से कमाते हैं, घर का खर्च भी संभालते हैं, और अब एक कार खरीदने का सपना देख रहे हैं। लेकिन क्या ये सपना कहीं आपकी जेब पर भारी तो नहीं पड़ जाएगा? यहीं आता है 20/4/10 नियम का आखिरी लेकिन सबसे ज़रूरी हिस्सा – '10% का फंडा'।

इसका सीधा मतलब है कि आपकी मासिक कमाई का ज़्यादा से ज़्यादा 10% हिस्सा ही कार पर खर्च होना चाहिए — चाहे वो ईएमआई हो, पेट्रोल-डीज़ल हो, सर्विसिंग हो या छोटी-मोटी मरम्मत।

 

क्यों ज़रूरी है ये सीमा?

 

अब देखिए, कार खरीदना सिर्फ EMI भरना नहीं है। उसके बाद भी हर महीने कुछ ना कुछ खर्चा होता ही है – तेल डलवाओ, सर्विस करवाओ, बीमा दो, और कब कोई पुर्जा खराब हो जाए कौन जाने! अगर हर चीज़ मिलाकर खर्च आपकी सैलरी का 10% से ऊपर चला गया, तो फिर बाकी ज़रूरी खर्चों और बचत के लिए क्या बचेगा?

 

उदाहरण से समझिए

 

मान लीजिए आपकी सालाना कमाई ₹20 लाख है। यानी हर महीने ₹1.67 लाख की आमदनी। ऐसे में कार से जुड़ा कुल खर्च ₹16,700 महीने से ज़्यादा नहीं होना चाहिए। अब ज़रा देखिए, अगर आपने ₹10 लाख की कार खरीदी और 20% डाउन पेमेंट देने के बाद ₹8 लाख का लोन लिया। 4 साल की अवधि में, 8% ब्याज दर पर आपकी EMI करीब ₹19,530 बनेगी। अब दिक्कत ये है कि ये EMI ही आपके तय 10% यानी ₹16,700 से ज़्यादा है। ऊपर से पेट्रोल, सर्विसिंग और बाकी खर्च अलग से।

 

तो क्या करें?

 

  • या तो कार का बजट कम करें, यानी ₹10 लाख से सस्ती कार देखें
     
  • या डाउन पेमेंट बढ़ाएं, ताकि लोन कम लेना पड़े
     
  • या फिर किसी ऐसे बैंक से लोन लें जो कम ब्याज पर दे
     

यही तरीका है खुद को कर्ज़ में डूबने से बचाने का और अपनी लाइफस्टाइल को संतुलित रखने का।

 

अगर आप चाहते हैं कि कार चलाने का मजा बोझ न बने, तो इस '10% वाले नियम' को अपनी फाइनेंशियल प्लानिंग का हिस्सा ज़रूर बनाइए। कार ज़िंदगी आसान बनाने के लिए होती है, मुश्किल नहीं।

 

अपने 20/4/10 बजट में रहने की रणनीति कैसे बनायें।

 

अब जब हमने देखा कि 10 लाख की कार हमारे तय बजट और नियमों से बाहर जाती है, तो सवाल ये उठता है — अब करें तो करें क्या? पहली नजर में 20/4/10 नियम थोड़ा सख्त ज़रूर लगता है, लेकिन असल में यही नियम बाद में आपके सिर पर कर्ज़ का बोझ नहीं बनने देता।

 

सच कहें तो जब आप बाकी खर्चों (घर, राशन, बच्चों की पढ़ाई, और सेविंग्स) के बाद महीने की बजटिंग करते हैं, तो कार पर 10% खर्च ही सबसे संतुलित और सुरक्षित विकल्प बनता है। अब आइए समझते हैं कुछ देसी जुगाड़, जिससे आप अपनी पसंद की कार इस नियम के दायरे में रहकर ही खरीद सकते हैं।

 

1. दूसरी कारों पर भी नज़र डालें

 

जरूरी नहीं कि आप जिस कार को पसंद कर रहे हैं, उसी का टॉप मॉडल लें। हो सकता है उसका बेस वेरिएंट आपके बजट में आ जाए — थोड़ा कम फीचर्स होंगे लेकिन जेब पर हल्का पड़ेगा।
या फिर आप बड़ी कार छोड़कर छोटी लेकिन टॉप वेरिएंट कार ले सकते हैं जिसमें ज़्यादा फीचर्स मिलेंगे।
और हाँ, सेकेंड हैंड कार को नजरअंदाज़ मत कीजिए। अच्छी कंडीशन में मिलने वाली पुरानी कारें कई बार नए जैसी सुविधाएँ देती हैं, वो भी आधी कीमत पर।

 

2. डाउन पेमेंट थोड़ा और बढ़ाइए

 

जैसा पहले समझाया गया था — ज़्यादा डाउन पेमेंट का मतलब है कम लोन, और कम लोन का मतलब है कम EMI। अगर आपके पास थोड़ी और बचत है, तो 20% की बजाय 30% या 35% डाउन पेमेंट करिए। इससे आपकी EMI कम हो जाएगी और आप 10% खर्च की सीमा में आसानी से फिट हो जाएंगे।
हाँ, हो सकता है इससे आपकी कार खरीद कुछ महीने टल जाए, लेकिन बाद में मन को बहुत सुकून मिलेगा।

 

3. लोन देने वाले अलग-अलग ऑप्शन को टटोलिए

 

सिर्फ बड़े-बड़े बैंकों पर ही भरोसा मत करिए। आजकल बहुत सारे फाइनेंस कंपनियाँ भी कार लोन देती हैं। अगर आपकी क्रेडिट हिस्ट्री अच्छी है, तो आप किसी ऐसे संस्थान से लोन ले सकते हैं जो ब्याज दर कम रखता हो। बेस्ट डील पाने के लिए थोड़ा रिसर्च करें, अलग-अलग बैंकों और NBFCs की दरों की तुलना करें — इससे आप EMI में अच्छी-खासी बचत कर सकते हैं।

 

आखिर में बात सीधी सी है: कार वो चुनो जो आपकी ज़रूरत और जेब — दोनों के हिसाब से फिट बैठे। दिखावे की दौड़ में फँसकर ऐसा कर्ज़ मत पालो जो बाद में परेशानी बन जाए। सही प्लानिंग और थोड़ी समझदारी से आप अपनी मनपसंद गाड़ी भी ले सकते हैं और वित्तीय संतुलन भी बनाए रख सकते हैं।

अगर आप चाहें तो मैं इस लेख के अगले हिस्से भी इसी देसी, सरल और रोचक स्टाइल में तैयार कर सकता हूँ। बताइए!

 

20/4/10 नियम की कुछ खामियां

 

देखिए, 20/4/10 नियम अपने आप में बढ़िया है — ये आपको गाड़ी खरीदते समय पैसों का हिसाब-किताब सिखाता है। लेकिन हर नियम में कुछ न कुछ खामियाँ तो होती ही हैं। ऐसे ही कुछ नुक़्स इस नियम में भी हैं जो आपको ध्यान में रखने चाहिए। हमारे पिछले उदाहरण में भी आपने देखा — ₹10 लाख की कार, जो पहली नजर में बजट में लगती है, वो इस नियम के हिसाब से फिट नहीं बैठती। तो चलिए जानते हैं कि ये नियम कहां-कहां पर थोड़ा तंग करता है।

 

1. विकल्पों की कमी — पसंद की गाड़ी लेना मुश्किल

 

इस नियम की सबसे पहली कमी ये है कि ये आपके कार चुनने के विकल्प बहुत घटा देता है। आप शायद वो मॉडल या वेरिएंट न खरीद पाएं जो आपको पसंद है, क्योंकि वो आपके बजट से बाहर हो जाएगा। कई बार लोग फीचर्स के साथ समझौता कर लेते हैं, जो जरूरी नहीं कि हर किसी के लिए सही हो।

 

2. डाउन पेमेंट ज़्यादा देना हर किसी के बस की बात नहीं

 

20% डाउन पेमेंट की बात तो सही है, लेकिन हर कोई इतनी रकम एक साथ निकाल नहीं सकता। कुछ लोगों के लिए ₹2 लाख या ₹3 लाख जोड़ना बहुत बड़ी बात होती है। और अगर आप इतने पैसे इकट्ठा करने के चक्कर में गाड़ी खरीदने में बहुत देर कर दें, तो जरूरी मौके भी निकल सकते हैं — जैसे डिस्काउंट ऑफर या आपकी ज़रूरत की टाइमिंग।

 

3. सिर्फ 4 साल में लोन चुकाना — थोड़ा कड़क नियम

 

अब हर किसी की कमाई एक जैसी नहीं होती। अगर आपकी इनकम थोड़ी कम है या पहले से कुछ और EMI चल रही है, तो 4 साल में पूरा लोन चुकाना भारी पड़ सकता है। कुछ बैंक या NBFC पाँच साल के लिए लोन देते हैं और कई बार ब्याज दर भी कम कर देते हैं, जिससे EMI भी कम होती है। तो ऐसे में नियम थोड़ा लचीला होना चाहिए।

 

4. कार चलाने का खर्च हर किसी के लिए अलग होता है

 

अब देखिए, हर कार की चलने की लागत अलग होती है — कोई ज़्यादा पेट्रोल पीती है, कोई कम; किसी में सर्विसिंग सस्ती है, किसी में महँगी। इसलिए ये कहना कि हर किसी को अपनी मासिक आय का सिर्फ 10% ही कार पर खर्च करना चाहिए — ये हर बार लागू नहीं होता। मान लीजिए, कोई कार लवर है — उसे गाड़ी में पैसा लगाना पसंद है। वो शायद 15% तक भी खर्च कर दे, लेकिन फिर भी संतुष्ट रहेगा।

 

20/4/10 वाला नियम कब अपनाना चाहिए और कब छोड़ देना चाहिए?

 

भाई, गाड़ी खरीदना सिर्फ एक ज़रूरत नहीं, कई बार एक सपना भी होता है। अब सपनों में थोड़ा खर्च ज़्यादा भी हो जाए, तो दिल मान ही जाता है। लेकिन ज़िंदगी सिर्फ दिल से नहीं, दिमाग से भी चलती है। ऐसे में अगर आप सोच-समझकर गाड़ी खरीदना चाहते हैं, तो 20/4/10 वाला ये फॉर्मूला बड़ी मदद कर सकता है।

 

लेकिन हर चीज़ हर हाल में फिट नहीं बैठती। ये नियम भी हर किसी के लिए नहीं बना। चलिए, जानते हैं कि कब ये नियम अपनाना सही रहेगा और कब इसे नजरअंदाज़ करना ही बेहतर होगा।

 

इस नियम का इस्तेमाल ज़रूर करें, अगर...

 

  • आप अपने पैसों का पूरा हिसाब-किताब रखते हैं।
    मतलब EMI, खर्च, इनकम – सब पर आपकी पैनी नज़र रहती है।
     
  • आपका मासिक बजट पहले से तय है।
    हर महीने कितना खर्च करना है, कितना बचाना है – ये आपको पहले से पता होता है।
     
  • आपकी कार कोई "स्पेशल ड्रीम" नहीं, बस एक जरूरत है।
    यानि बेसिक चलने लायक अच्छी कार चाहिए, ब्रांड या फीचर्स को लेकर ज़िद नहीं।
     
  • आप लंबी अवधि में फाइनेंशियली स्ट्रॉन्ग बनना चाहते हैं।
    आज थोड़ा कंट्रोल रखेंगे तो कल ज़्यादा बचत और शांति मिलेगी।
     
  • अगर आप पहली बार कार खरीद रहे हैं।
    और अभी तक गाड़ी चलाने के खर्चों का कोई अनुभव नहीं है, तो ये नियम आपकी अच्छी मदद कर सकता है।
     

इस नियम से बचिए, अगर...

 

  • आपकी आमदनी रेगुलर नहीं है।
    जैसे फ्रीलांसिंग, सीज़नल जॉब या बिज़नेस में उतार-चढ़ाव रहता है।
     
  • आपके पास सेविंग बहुत कम है।
    यानि डाउन पेमेंट देने में ही दिक्कत हो रही है।
     
  • आपको किसी और सोर्स से अच्छी फाइनेंशियल मदद मिलने वाली है।
    जैसे फैमिली से सपोर्ट, बोनस या कुछ और बड़ी रकम आने वाली हो।

     

  • आप पहले से कई कर्जों में फंसे हैं।
    लोन, EMI, क्रेडिट कार्ड सब पहले से सिर पर सवार हैं।
     
  • आप जिस गाड़ी को लेना चाहते हैं, उसमें कोई समझौता नहीं करना चाहते।
    यानि आपको सिर्फ वही मॉडल चाहिए, चाहे कुछ भी हो जाए – तो ये नियम शायद आपको रोकने लगेगा।
     

खास बात: समझदारी से करें कार की खरीदारी

 

कार खरीदना सिर्फ एक सपना पूरा करने जैसा नहीं होता, ये आपकी जेब से जुड़ा बड़ा फैसला भी होता है। नई कार की चमक-दमक तो लुभाती है, लेकिन इसके पीछे छुपे खर्चों का बोझ नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। खासतौर पर तब जब आपको पता हो कि जिस दिन कार शोरूम से बाहर निकलेगी, उसी दिन उसकी कीमत भी गिरने लगेगी।

 

और अगर आप कार की कीमत में बहुत बड़ी गिरावट से बचना चाहते हैं तो सेकंड हैंड कार खरीदने का समझदारी भरा फैसला ले सकते हैं। और कार खरीद से सम्बन्धित दस्तावेजों की जानकारी के लिए हमारा आर्टिकल “सेकंड हैंड कार लोन के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ – पूरी चेकलिस्ट” पढ़ सकते हैं।

 

20/4/10 नियम न कोई सख्त कानून है, न ही कोई एकदम सही फार्मूला — लेकिन ये ज़रूर एक बढ़िया गाइड बन सकता है, जो कार खरीदने के बजट को काबू में रखता है, EMI को बोझ नहीं बनने देता और आपकी फाइनेंशियल सेहत को भी ठीक बनाए रखता है। इस नियम की खास बात ये है कि आप अपनी ज़रूरत और हालात के मुताबिक इसमें थोड़े बहुत बदलाव कर सकते हैं। इसका मकसद सिर्फ ये है कि कार खरीदने का फैसला ऐसा हो जो आपको खुशी भी दे और जेब पर भारी भी न पड़े।

 

तो अब आपकी बारी है!
क्या आपने कभी ऐसा कोई तरीका अपनाया है जिससे कार खरीदना आसान हुआ हो? या फिर कोई सीख जो दूसरों के काम आ सकती हो? चलिए, अपने अनुभव शेयर कीजिए Cars24 के ऑटो कम्युनिटी – CLUTCH पर, जहाँ गाड़ियों को लेकर हर दिन कुछ नया और मजेदार सुनने को मिलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सभी को बड़ा करें
प्र. भारत में अपनी सैलरी के हिसाब से मुझे कार पर कितना खर्च करना चाहिए?
प्र. कार खरीदने का सबसे अच्छा समय कौन सा होता है?
प्र. ₹40,000 सैलरी में कितना कार लोन मिल सकता है?
प्र. कार लोन का सबसे अच्छा फॉर्मूला क्या है?
प्र. क्या मैं इस नियम को अपनी ज़रूरत के हिसाब से बदल सकता हूँ?
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